अमेरिकी टैरिफ का असर: टैरिफ वॉर के बाद भारत बना नया व्यापारिक मैदान

अमेरिका द्वारा चीन पर लगाए गए उच्च टैरिफ के कारण, चीन के लिए अमेरिकी बाज़ार में सामान बेचना महंगा और कठिन हो गया है। ऐसे में चीन ने अपने निर्यात को अन्य देशों की ओर मोड़ना शुरू कर दिया है। भारत, इस परिप्रेक्ष्य में, एक महत्वपूर्ण गंतव्य बनकर उभरा है।


अमेरिका ने चीन से आयातित वस्तुओं पर 145% तक का टैरिफ लगाया। ऐसे में चीन अब अपने उत्पादों को दूसरे देशों में बेचने की कोशिश कर रहा है। अब चीन भारत जैसे विकाशील देशो में काम दाम में ज्यादा से ज्यादा निर्यात करने की कोशिश में लगा है।

अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 4 फरवरी 2025 को सभी चीनी आयातों पर 10% टैरिफ लागू किया इसके जवाब में, चीन ने 10 फरवरी से अमेरिकी आयातों पर शुल्क बढ़ाकर 15% टैरिफ कोयला और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) पर और 10% टैरिफ: कच्चे तेल, कृषि मशीनरी, बड़े इंजन वाले वाहन और पिकअप ट्रकों पर लागू किया। इस कदम को "प्रारंभिक हमला" कहा गया और यह अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के नए चरण की शुरुआत थी। इसके बाद 3 मार्च 2025 को अमेरिका ने चीनी वस्तुओं पर टैरिफ को और 10% बढ़ाकर कुल 20% कर दिया। साथ ही, मैक्सिको और कनाडा से आयात पर भी 25% टैरिफ लगाया गया, जिससे अमेरिका के तीन प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ नए व्यापार विवाद शुरू हो गए। 3 मार्च को चीनी वस्तुओं पर टैरिफ बढ़ाने के जवाब में, चीन ने 10 मार्च से कृषि उत्पादों पर प्रभावी होने वाले टैरिफ की घोषणा की। फरवरी और मार्च के बाद चीन ने अप्रैल में टैरिफ वृद्धि में पहल करते हुए 9 अप्रैल 2025 को अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ को 84% तक बढ़ा दिया। इसके बाद 11 अप्रैल 2025 को अमेरिका ने चीन से आयातित वस्तुओं पर टैरिफ को 145% तक बढ़ा दिया, जबकि चीन ने अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ को 125% तक बढ़ाया। इससे वैश्विक बाजारों में भारी उथल-पुथल मची और व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ा।

अमेरिका-चीन टैरिफ में बदलाव

अमेरिका ने चीन पर लगाए गए टैरिफ को लेकर हाल ही में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। 12 मई 2025 को जिनेवा में हुई उच्च स्तरीय वार्ता के बाद, अमेरिका और चीन ने आपसी सहमति से अपने-अपने टैरिफ में अस्थायी रूप से कटौती करने का निर्णय लिया है। अमेरिका ने चीन से आयातित वस्तुओं पर टैरिफ को 145% से घटाकर 30% कर दिया है, जबकि चीन ने अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ को 125% से घटाकर 10% किया है। यह कटौती 90 दिनों के लिए अस्थायी रूप से लागू की गई है, ताकि दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ताओं को आगे बढ़ाया जा सके। साथ ही कुछ संवेदनशील वस्तुओं, जैसे फेंटानिल से संबंधित उत्पादों पर, टैरिफ में कोई बदलाव नहीं किया गया है और वे पहले की दरों पर ही लागू रहेंगे।

टैरिफ के वैश्विक प्रभाव

अमेरिका और चीन द्वारा टैरिफ बढ़ाने और फिर अस्थायी रूप से घटाने के निर्णय से व्यापार में अनिश्चितता आ गयी है, कंपनियों को नहीं पता कि कब टैरिफ दोबारा बढ़ जाएंगे, जिससे दीर्घकालिक योजनाएं बाधित हो रही हैं और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) में अस्थिरता बढ़ी है। उपभोक्ता वस्तुओं (मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि उत्पाद) की कीमतों में अस्थिरता देखी गई। कुछ उत्पादों की कीमतें बढ़ीं, जिससे महंगाई पर असर पड़ा। कंपनियां अब चीन के बजाय वियतनाम, भारत, बांग्लादेश जैसे विकल्पों की तलाश कर रही हैं।

चीन की रणनीति: नए बाजारों की ओर रुख

अमेरिका द्वारा चीन पर लगाए गए उच्च टैरिफ (import duties) के कारण चीन के लिए अमेरिकी बाज़ार में सामान बेचना महंगा और कठिन हो गया है। ऐसे में चीन अब अपने उत्पादों को दूसरे देशों में बेचने (निर्यात करने) की कोशिश कर रहा है जिसमे भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, मलेशिया जैसे विकासशील देश शामिल है जो चीन के सस्ते सामान की मांग रखते हैं। अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए, चीन ने दक्षिण-पूर्व एशिया, यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन जैसे देशों में निर्यात बढ़ाया गया है

अमेरिका-चीन टैरिफ कटौती: भारत के लिए अवसर या चुनौती?

अमेरिका-चीन टैरिफ बदलावों और वैश्विक टैरिफ परिवर्तनों का भारत पर मिला-जुला प्रभाव पड़ा है इसमें कुछ नए अवसर भी पैदा हुए हैं और कुछ चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। अमेरिका और यूरोपीय कंपनियाँ “China Plus One” नीति अपना रही हैं यानी चीन के अलावा दूसरा देश चुनना, ऐसे में भारत, वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ एक बड़ा विकल्प बनकर उभरा है। इससे भारत में निवेश और मैन्युफैक्चरिंग की संभावनाएँ बढ़ी हैं। अमेरिका द्वारा चीन से आयात में कमी के कारण भारत को टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो पार्ट्स जैसे सेक्टर्स में निर्यात का अवसर मिला है और ई-कॉमर्स और सस्ते कंज्यूमर प्रोडक्ट्स में भारत की भागीदारी बढ़ रही है। भारत को टैरिफ परिवर्तनों के कारण कुछ चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है, टैरिफ कटौती के बाद चीन से फिर से सस्ते उत्पाद अमेरिका और यूरोप में पहुँचने लगे हैं। इसका असर भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ा है। अमेरिका में ना बिक पाने वाला सस्ता चीनी माल अब भारत जैसे बाजारों में भेजा जा रहा है जिसके चलते चीन से सस्ते उत्पादों की भारत में बाढ़ आ सकती है, इससे घरेलू MSME सेक्टर पर दबाव बढ़ा है। अमेरिकी टैरिफ नीतियाँ बार-बार बदलने से विदेशी निवेशक भारत में भी सतर्क हो गए हैं, क्योंकि वे रणनीति में स्थिरता चाहते हैं।

भारत सरकार की प्रतिक्रिया

अमेरिका-चीन टैरिफ युद्ध और वैश्विक व्यापार अस्थिरता के बीच भारत सरकार ने कई रणनीतिक कदम उठाए हैं ताकि देश की अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके और भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित किया जा सके। भारत सरकार ने सस्ते चीनी सामान के भारत में प्रवेश को रोकने के लिए कई उत्पादों पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाने की प्रक्रिया शुरू की है। भारत ने चीन से आयातित सस्ते स्टील पर 12% अस्थायी टैरिफ लगाने की योजना बनाई है। अमेरिका के खिलाफ प्रतिशोधात्मक टैरिफ का प्रस्ताव रखते हुए भारत ने अमेरिका द्वारा स्टील और एल्युमिनियम पर लगाए गए टैरिफ के जवाब में कुछ अमेरिकी उत्पादों पर प्रतिशोधात्मक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव WTO को दिया है। यह कदम $7.6 बिलियन के निर्यात को प्रभावित कर सकता है और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं पर प्रभाव डाल सकता है। भारत सरकार उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना, PLI (Production Linked Incentive) के ज़रिए भारत घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यदि भारत बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स, नीति स्थिरता और घरेलू उद्योगों को समर्थन देने में सफल होता है, तो वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

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